ए.पी. हिंदुजा
बॉम्बे हाईकोर्ट ने पीडी हिंदुजा अस्पताल एवं मेडिकल रिसर्च सेंटर के मैनेजिंग ट्रस्टी ए.पी. हिंदुजा को 1992 में शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही से मुक्त कर दिया है। अस्पताल में मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने के बाद एक मरीज की ऑपरेशन वाली आंख की रोशनी चली गई थी। आरोप था कि आंखों के इलाज में घटिया गुणवत्ता वाली दवाओं के इस्तेमाल के कारण ऐसा हुआ।
न्यायमूर्ति रणजीतसिंह राजा भोंसले की एकल पीठ ने हिंदुजा के खिलाफ मामला खारिज करते हुए कहा, “सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति ट्रस्टी है और उसे किसी ट्रस्ट का मैनेजिंग ट्रस्टी कहा जाता है, वह फार्मेसी में काम करने वाले किसी कर्मचारी के प्रत्येक कृत्य के लिए जिम्मेदार नहीं हो जाता।” न्यायाधीश ने कहा कि पूरी कार्यवाही में हिंदुजा का नाम लेने और उन्हें मैनेजिंग ट्रस्टी बताने के अलावा ऐसा कोई अन्य आधार नहीं था, जिसके जरिए उन्हें आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सके।
यह मामला खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने मरीज के बेटे डॉ. सुनील पाटिल की शिकायत के बाद शुरू किया था। जून 1992 में दर्ज शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उनके पिता उमाकांत पाटिल के मोतियाबिंद के ऑपरेशन के दौरान विसिलॉन (Visilon) नामक आई ड्रॉप के इस्तेमाल से ऑपरेशन वाली आंख में फंगल संक्रमण हो गया, जिसके कारण उनकी आंखों की रोशनी चली गई।
प्रारंभिक जांच में FDA ने दावा किया कि अस्पताल में इस्तेमाल की गई दवा निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरी। दवा की स्टेरिलिटी यानी रोगाणुमुक्त होने की जांच के दौरान उसमें सूक्ष्मजीवों की वृद्धि भी पाई गई।
इसके बाद औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की विभिन्न धाराओं के उल्लंघन के आरोप में मजिस्ट्रेट अदालत में आपराधिक कार्यवाही शुरू की गई। इसमें दवा निर्माता कंपनियों, विक्रेताओं एवं वितरकों, फार्मासिस्टों, अस्पताल और उसके मैनेजिंग ट्रस्टी को आरोपी बनाया गया था।
ए.पी. हिंदुजा ने मजिस्ट्रेट अदालत से राहत नहीं मिलने के बाद हाईकोर्ट का रुख किया था। मझगांव स्थित महानगर मजिस्ट्रेट अदालत ने 3 सितंबर 2015 को उन्हें आरोपमुक्त करने की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद सत्र अदालत ने भी 2 दिसंबर 2017 को मजिस्ट्रेट अदालत के फैसले को बरकरार रखा था।
ए.पी. हिंदुजा के वकील ने हाईकोर्ट में दलील दी कि FDA की ओर से पूछे गए कुछ सवालों के जवाब में अस्पताल द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर ही उन्हें इस मामले में आरोपी बनाया गया था।
वहीं, सरकारी वकील ने ए.पी. हिंदुजा के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही समाप्त करने की मांग का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि मैनेजिंग ट्रस्टी होने के नाते हिंदुजा ट्रस्ट और उसके अस्पताल की गतिविधियों के लिए जिम्मेदार थे। प्रतिष्ठान के प्रभारी के रूप में उनका अस्पताल के दैनिक कामकाज और संचालन पर समग्र नियंत्रण था।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि किसी ट्रस्टी की नागरिक जिम्मेदारियों को इतनी सामान्य और अनौपचारिक तरीके से उसकी आपराधिक जिम्मेदारी के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। केवल ट्रस्टी होना आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक कि किसी वैधानिक प्रावधान में ऐसा स्पष्ट रूप से न कहा गया हो।
अदालत ने कहा, “केवल किसी ट्रस्ट का ट्रस्टी या किसी कंपनी का निदेशक होने से कोई व्यक्ति उस ट्रस्ट या कंपनी द्वारा किए गए प्रत्येक कृत्य के लिए स्वतः जिम्मेदार या परोक्ष रूप से उत्तरदायी नहीं हो जाता।”
हाईकोर्ट ने आगाह किया कि इस तरह के तर्क को स्वीकार करना एक खतरनाक सिद्धांत को मान्यता देने जैसा होगा, जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।
